मृदा स्वास्थ्य सुधार का वैज्ञानिक उपाय बनी हरी खाद सनई और कैंचा जैसी दलहनी फसलें बढ़ा रहीं मिट्टी की उर्वरता, रासायनिक उर्वरकों पर घट रही निर्भरता

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हाथरस। सघन खेती और रासायनिक उर्वरकों के लगातार उपयोग से कमजोर होती मृदा को पुनर्जीवित करने में हरी खाद एक प्रभावी वैज्ञानिक तकनीक के रूप में उभर रही है। कृषि वैज्ञानिकों के अनुसार यह न केवल मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है, बल्कि मृदा संरचना, जल धारण क्षमता और सूक्ष्मजीव सक्रियता को भी सुदृढ़ बनाती है।

चन्द्र शेखर आज़ाद कृषि एवं प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, कानपुर के प्रोफेसर डॉ. कौशल कुमार तथा कृषि विज्ञान केंद्र, हाथरस के वैज्ञानिक डॉ. बलवीर सिंह ने बताया कि सनई और कैंचा जैसी दलहनी फसलें हरी खाद के रूप में सबसे अधिक उपयोगी मानी जाती हैं। इन फसलों की जड़ों में मौजूद राइजोबियम जीवाणु प्रति हेक्टेयर 60 से 150 किलोग्राम तक नाइट्रोजन स्थिरीकरण करने में सक्षम होते हैं।

उन्होंने बताया कि सनई मध्यम प्रकार की भूमि के लिए सर्वोत्तम हरी खाद फसल है, जो 20 से 30 टन तक हरा जैव पदार्थ तथा 85 से 125 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रति हेक्टेयर उपलब्ध कराती है। वहीं कैंचा फसल क्षारीय, सूखा तथा जलभराव जैसी समस्याग्रस्त मिट्टियों में भी सफल रहती है और 20 से 25 टन हरा पदार्थ तथा 85 से 105 किलोग्राम नाइट्रोजन प्रदान करती है। इस कारण इसे प्रभावी “मृदा सुधारक” माना जाता है।

वैज्ञानिकों के अनुसार हरी खाद के उपयोग से मिट्टी में ह्यूमस की मात्रा बढ़ती है, जिससे सूक्ष्मजैविक गतिविधियां तेज होती हैं और मिट्टी की स्थायी उर्वरता में सुधार आता है। यह प्रक्रिया मिट्टी के स्थूल घनत्व को कम कर उसकी संरचना को भुरभुरी बनाती है, जिससे जड़ों का विकास गहरा होता है तथा जल धारण क्षमता बढ़ती है।

विशेषज्ञों ने बताया कि हरी खाद वाली फसलों को 40 से 50 दिन अथवा 6 से 8 सप्ताह की अवस्था में मिट्टी में पलट देना चाहिए। इस दौरान अपघटन से बनने वाले कार्बनिक अम्ल मिट्टी में उपस्थित अघुलनशील फास्फोरस, पोटाश तथा जिंक और आयरन जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों को पौधों के लिए सुलभ बना देते हैं। इससे पोषक तत्व चक्रण तेज होता है और रासायनिक उर्वरकों की आवश्यकता 25 से 30 प्रतिशत तक कम हो सकती है।

इसके अतिरिक्त हरी खाद की फसल मिट्टी की सतह को ढंक कर मृदा अपरदन रोकती है, खरपतवारों को नियंत्रित करती है तथा कार्बन पृथक्करण के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में भी सहायक सिद्ध होती है।

कृषि वैज्ञानिकों ने किसानों को सलाह दी है कि हरी खाद की अधिकतम उपयोगिता के लिए उपयुक्त फसल का चयन, समय पर पलटाई तथा राइजोबियम कल्चर का प्रयोग अवश्य करें।

Jitendra

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