थाली में धीमा ज़हर: खाद्यान्नों में मिलावट और जवाबदेही का संकट
थाली में धीमा ज़हर: खाद्यान्नों में मिलावट और जवाबदेही का संकट
जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं में 'अन्न' का स्थान सर्वोपरि है, लेकिन आज यही अन्न आम नागरिक के स्वास्थ्य के लिए सबसे बड़ा संकट बन चुका है। दाल, चावल, आटा, मसाले, तेल से लेकर दूध तक—हर रोज़ की थाली में मिलावट का ज़हर परोसा जा रहा है। मुनाफाखोरी और कमजोर नियामक तंत्र के गठजोड़ ने भोजन को पोषण का स्रोत बनाने के बजाय गंभीर बीमारियों की जड़ बना दिया है। ऐसे में यह सवाल केवल जनस्वास्थ्य का नहीं, बल्कि व्यवस्था की विफलता और नागरिक अधिकारों के हनन का है: इस मिलावट का असली ज़िम्मेदार कौन है?
चिंताजनक आंकड़े: आंकड़ों के आईने में मिलावट की सच्चाई
भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण (FSSAI) और संसदीय समितियों की रिपोर्टें इस संकट की भयावहता को स्पष्ट करती हैं:
सैंपल फेल होने की उच्च दर: FSSAI की वार्षिक रिपोर्टों के अनुसार, देशभर से एकत्र किए गए खाद्य नमूनों में से 25% से 30% नमूने सुरक्षा मानकों पर खरे नहीं उतरते (या तो वे सब-स्टैंडर्ड होते हैं या असुरक्षित/मिसब्रांडेड)।
दूध और डेयरी उत्पादों में मिलावट: राष्ट्रीय दूध सुरक्षा सर्वेक्षण (NMSS) के आंकड़ों के मुताबिक, देश में बिकने वाले दूध के नमूनों में लगभग 7% सैंपल में डिटर्जेंट, यूरिया, हाइड्रोजन पेरोक्साइड और स्टार्च जैसे खतरनाक रसायन पाए गए, जबकि 40% से अधिक में गुणवत्ता मानकों का अभाव था।
मसालों और तेल का संकट: मसालों में सुडान डाई (कार्सिनोजेनिक रंग), लेड क्रोमेट और स्टार्च; तथा खाद्य तेलों में आर्जीमोन तेल व सस्ते मिनरल ऑयल की मिलावट के मामले लगातार सामने आते रहे हैं।
कमज़ोर सज़ा दर: खाद्य अपमिश्रण के मामलों में कानूनी कार्रवाई बेहद सुस्त है। अदालतों में दायर मामलों में दोषसिद्धि (Conviction Rate) की दर 20% से 30% से भी कम रहती है, जिससे अपराधियों में कानून का डर लगभग खत्म हो चुका है।
मिलावट के विविध रूप: थाली से शरीर तक क्या पहुंच रहा है?