मौत के बाद जागता है सिस्टम: अवैध अस्पतालों पर कार्रवाई कब होगी? सीएमओ ध्यान दें इधर, सेटिंग का खेल से बना तालमेल, अनट्रेंड डॉक्टर की जिले में वाही-वाही मचा रखी है तबाही-तबाही, सासनी में लगातार हुए दो केस

-मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़, हादसों के बाद ही हरकत में आता स्वास्थ्य विभाग
-सासनी में लगातार हुए दो केस, परिवार पर टूटा दुखों का पहाड़
संवाददाता, (जितेन्द्र कुमार) विशेष रिपोर्ट
जनपद हाथरस में अवैध रूप से संचालित अस्पतालों और क्लीनिकों का जाल लगातार फैलता जा रहा है। बिना मानकों, बिना विशेषज्ञ डॉक्टरों और बिना जरूरी संसाधनों के चल रहे इन अस्पतालों में मरीजों की जान जोखिम में डाली जा रही है। हैरानी की बात यह है कि स्वास्थ्य विभाग अक्सर तब जागता है, जब किसी मरीज की मौत हो जाती है या कोई बड़ा हादसा सामने आता है। इसके बाद जांच टीम गठित होती है, नोटिस जारी किए जाते हैं और कुछ दिनों तक अभियान चलाकर कार्रवाई का दावा किया जाता है।
हाल के दिनों में कई ऐसे मामले सामने आए हैं, जहां इलाज के दौरान मरीजों की मौत के बाद परिजनों ने अस्पतालों पर लापरवाही का आरोप लगाया। कई अस्पताल ऐसे पाए गए, जिनके पास न तो पंजीकरण था और न ही प्रशिक्षित डॉक्टर। बावजूद इसके वे खुलेआम ऑपरेशन से लेकर गंभीर मरीजों का इलाज कर रहे थे।
झोलाछापों के भरोसे चल रहा इलाज :
ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में बड़ी संख्या में निजी अस्पताल बिना मानकों के संचालित हो रहे हैं। कई जगहों पर कंपाउंडर और अप्रशिक्षित लोग डॉक्टर बनकर मरीजों का इलाज कर रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग की टीम कभी-कभार छापेमारी कर कुछ अस्पतालों को सील करती है, लेकिन कुछ ही दिनों बाद वे फिर से चालू हो जाते हैं।
स्थानीय लोगों का कहना है कि विभागीय मिलीभगत के कारण अवैध अस्पतालों का कारोबार फल-फूल रहा है। अगर नियमित जांच और सख्त कार्रवाई हो तो ऐसे अस्पतालों पर रोक लग सकती है।
हादसे के बाद शुरू होती है जांच :
जब किसी अस्पताल में प्रसूता की मौत, गलत इंजेक्शन लगाने या ऑपरेशन में लापरवाही जैसी घटनाएं सामने आती हैं, तब स्वास्थ्य विभाग सक्रिय दिखाई देता है। अधिकारियों की टीम जांच के लिए पहुंचती है, लेकिन जांच रिपोर्ट आने तक मामला ठंडा पड़ जाता है। कई मामलों में दोषियों पर ठोस कार्रवाई तक नहीं हो पाती।
विशेषज्ञों का मानना है कि स्वास्थ्य विभाग को केवल शिकायत या हादसे के बाद नहीं, बल्कि नियमित निरीक्षण की व्यवस्था करनी चाहिए। अस्पतालों के पंजीकरण, डॉक्टरों की योग्यता, उपकरणों और आपातकालीन सुविधाओं की समय-समय पर जांच होनी चाहिए।
गरीब मरीज सबसे ज्यादा शिकार :
सरकारी अस्पतालों में भीड़ और संसाधनों की कमी के कारण गरीब और ग्रामीण मरीज निजी अस्पतालों की ओर रुख करते हैं। कम खर्च और तत्काल इलाज के नाम पर उन्हें ऐसे अस्पतालों में भर्ती कर लिया जाता है, जहां बुनियादी सुविधाएं तक नहीं होतीं। नतीजा, इलाज के नाम पर मरीजों की जिंदगी दांव पर लग जाती है।
जिम्मेदारी तय करने की मांग :
सामाजिक संगठनों और नागरिकों ने मांग की है कि अवैध अस्पतालों के खिलाफ स्थायी अभियान चलाया जाए। साथ ही उन अधिकारियों की जवाबदेही भी तय हो, जिनके क्षेत्र में बिना अनुमति अस्पताल संचालित हो रहे हैं।
लोगों का कहना है कि अगर समय रहते कार्रवाई हो जाए तो कई मासूम जिंदगियां बचाई जा सकती हैं। सवाल यही है कि आखिर स्वास्थ्य विभाग हर बार किसी की मौत के बाद ही क्यों जागता है?
Jitendra

