भारतीय राजनीति में लोकतंत्र बनाम 'कुलीनतंत्र': क्या राजनीति सिर्फ पारिवारिक विरासत बनकर रह गई है?
संपादकीय / विचार
लोकतंत्र बनाम परिवार तंत्र
भारतीय राजनीति में लोकतंत्र बनाम 'कुलीनतंत्र': क्या राजनीति सिर्फ पारिवारिक विरासत बनकर रह गई है?
उप-शीर्षक:
मतपेटियों के दौर में जन्मसिद्ध अधिकार६ की वापसी: विचारणीय सवाल यह है कि क्या सत्ता की चाबी अब योग्यता के बजाय केवल पारिवारिक उपनामों में सिमट रही है?
"लोकतंत्र की सबसे खूबसूरत बात यह है कि इसमें एक आम नागरिक भी देश के सर्वोच्च पद तक पहुंच सकता है। किंतु जब राजनीतिक दल पारिवारिक ट्रस्टों की तरह संचालित होने लगें, तो लोकतंत्र केवल नाम का रह जाता है।"
विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में भारत ने मताधिकार और जन-सरोकारों के अनेक मील के पत्थर तय किए हैं। लेकिन स्वतंत्रता के साढ़े सात दशक बाद आज सार्वजनिक विमर्श में सबसे तीखा और प्रासंगिक प्रश्न यह उभर रहा है कि क्या समकालीन राजनीति जनसेवा का माध्यम न रहकर एक बंद पारिवारिक उपक्रम में तब्दील हो चुकी है?
सत्ता का संकेंद्रण और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य
आजादी की लड़ाई के दौरान राजनीति त्याग और समर्पण का पर्याय थी। स्वतंत्रता के बाद शुरुआती दशकों में नेतृत्व का विस्तार हुआ, किंतु धीरे-धीरे सत्ता के गलियारों में वंशानुगत प्रभाव गहराता गया।
राष्ट्रीय स्तर पर शुरुआत: केंद्र में कांग्रेस पार्टी और नेहरू-गांधी परिवार के दशकों के प्रभाव ने भारतीय राजनीति में इस विमर्श को स्थापित किया कि शीर्ष नेतृत्व पारिवारिक विरासत के रूप में स्थानांतरित हो सकता है।
क्षेत्रीय क्षत्रपों का उभार: 1980 और 1990 के दशक में कांग्रेस के एकाधिकार को चुनौती देने वाले क्षेत्रीय दलों का उदय हुआ। विडंबना यह रही कि गैर-बराबरी और सामाजिक न्याय के नाम पर बने दल समय के साथ और अधिक परिवार-केंद्रित हो गए:
उत्तर प्रदेश और बिहार: समाजवादी पार्टी (यादव परिवार), राष्ट्रीय जनता दल (लालू परिवार), लोक जनशक्ति पार्टी (पासवान परिवार)।
दक्षिण भारत: तमिलनाडु में डीएमके (करुणानिधि–स्टालिन परिवार), तेलंगाना में बीआरएस (केसीआर परिवार)।
अन्य राज्य: जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस व पीडीपी, पंजाब में अकाली दल (बादल परिवार), तथा महाराष्ट्र में शिवसेना और एनसीपी।
भले ही कुछ राष्ट्रीय पार्टियां स्वयं को कैडर-आधारित और परिवारवाद-मुक्त बताती हों, लेकिन राज्यों और स्थानीय स्तरों पर सांसदों-विधायकों के परिजनों को टिकट वितरण की प्रवृत्ति लगभग सभी दलों में कमोबेश नजर आती है।
वंशवाद के निरंतर फलने-फूलने के मुख्य कारक
राजनीतिक विश्लेषक इस बात पर एकमत हैं कि यह प्रवृत्ति केवल नेताओं की महत्वाकांक्षा नहीं, बल्कि व्यवस्थागत खामियों का परिणाम है:
प्रमुख कारकप्रभाव और कार्यप्रणाली
आंतरिक लोकतंत्र का अभावभारतीय राजनीतिक दलों में पारदर्शी प्राथमिक चुनाव नहीं होते। टिकट वितरण पूरी तरह हाईकमान या शीर्ष परिवार के हाथ में रहता है।
ब्रांड और नाम की पहचान पहले से स्थापित उपनाम के कारण उम्मीदवार को बिना जमीनी संघर्ष के मतदाताओं के बीच त्वरित पहचान और मीडिया कवरेज मिल जाता है।
संसाधनों और फंड्स का नियंत्रणराजनीतिक अभियानों की भारी लागत के बीच दल उन परिवारों को तरजीह देते हैं जो वित्तीय रूप से संपन्न और संगठनात्मक मशीनरी पर काबिज हैं।
जातिगत व क्षेत्रीय समीकरणकई क्षेत्रीय दलों ने पारिवारिक नेतृत्व को अपने मूल वोट बैंक (जाति/समुदाय) की एकजुटता बनाए रखने के 'फेविकोल' के रूप में इस्तेमाल किया।
लोकतंत्र के बुनियादी सिद्धांतों पर आघात
पारिवारिक राजनीति का सबसे गंभीर दुष्प्रभाव उन सामान्य कार्यकर्ताओं पर पड़ता है जो दशकों तक जमीन पर पार्टी का झंडा उठाते हैं, लेकिन निर्णायक पदों की बारी आते ही उन्हें किनारे कर किसी वंशज को आगे कर दिया जाता है।
योग्यता तंत्र का हनन: जब योग्यता, क्षमता और जनसंघर्ष के बजाय जन्म का आधार प्राथमिकता पाता है, तो नीति-निर्माण में नई प्रतिभाओं और विचारों का प्रवेश रुक जाता है।
जवाबदेही में कमी: पारिवारिक दल अक्सर किसी आंतरिक विरोध या समीक्षा से परे होते हैं। गलत निर्णयों के बावजूद नेतृत्व की कुर्सी सुरक्षित रहती है।
सिंडिकेट और सत्ता का केंद्रीकरण: नीतिगत फैसले जनता के व्यापक हित के बजाय परिवार और उससे जुड़े करीबी गुट के राजनीतिक व वित्तीय अस्तित्व को सुरक्षित रखने के इर्द-गिर्द घूमने लगते हैं।
दूसरा दृष्टिकोण: 'जनादेश की कसौटी' का तर्क
इस विमर्श का एक दूसरा पहलू भी है जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। पारिवारिक पृष्ठभूमि के नेताओं का तर्क होता है कि किसी डॉक्टर, वकील या व्यापारी का६ बच्चा अपने माता-पिता का पेशा चुन सकता है, तो राजनेता का क्यों नहीं?
जनता की अदालत में परीक्षण: लोकतंत्र में किसी भी उत्तराधिकारी को सीधे गद्दी नहीं मिलती; उसे चुनाव के मैदान में उतरकर जनता से वोट मांगना पड़ता है।
जनता द्वारा अस्वीकृति के उदाहरण: इतिहास गवाह है कि जब-जब वंशजों ने जन-आकांक्षाओं की उपेक्षा की, मतदाताओं ने उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखाया है (जैसे कई चुनावों में स्थापित राजनीतिक परिवारों के दिग्गजों की अप्रत्याशित हार)।
आगे की राह और अनिवार्य सुधार
यदि लोकतंत्र को सही मायने में 'जनता का, जनता द्वारा, जनता के लिए' बनाए रखना है, तो निम्नलिखित सुधार आवश्यक हैं:
दलों में अनिवार्य आंतरिक चुनाव: निर्वाचन आयोग के नियमों के तहत दलों में अध्यक्ष और संसदीय बोर्ड के चयन के लिए वास्तविक और गुप्त मतदान प्रणाली लागू हो।
पारदर्शी चुनावी फंडिंग: चुनाव खर्चों में पारदर्शिता लाई जाए ताकि केवल पूंजीपति या राजनीतिक घराने ही चुनाव लड़ने की स्थिति में न रहें।
जागरूक मतदाता वर्ग: जब तक मतदाता जाति, उपनाम और पारिवारिक निष्ठा से ऊपर उठकर उम्मीदवार के काम और विजन के आधार पर मतदान नहीं करेंगे, यह चक्र टूट नहीं सकता।
प्रमुख संदर्भ व अध्ययन
भारतीय संसदों और विधानसभाओं में वंशानुगत पृष्ठभूमि वाले जनप्रतिनिधियों के प्रतिशत और उनकी वित्तीय संपत्तियों पर नियमित विश्लेषण।
(कैनिगा वेनुकुलपल्ली व अन्य शोधकर्ताओं द्वारा): भारतीय संसदीय राजनीति में पारिवारिक प्रतिनिधित्व के बदलते स्वरूप पर अध्ययन।
संविधान सभा की चेतावनियां (डॉ. बी. आर. आंबेडकर का अंतिम भाषण, 25 नवंबर 1949): "राजनीति में भक्ति या व्यक्ति-पूजा सीधे तौर पर पतन और तानाशाही का मार्ग प्रशस्त करती है।"