वो कैंटीन जिसने लैब बना दी : मेरी अम्मा, मेरी टीचर*

Aug 26, 2026 - 18:54
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वो कैंटीन जिसने लैब बना दी : मेरी अम्मा, मेरी टीचर*

*वो कैंटीन जिसने लैब बना दी : मेरी अम्मा, मेरी टीचर*

आज मैं एक स्कूल की प्रिंसिपल हूँ। लोग मुझे मैडम कहते हैं। लेकिन आज मैं प्रिंसिपल बनकर नहीं, एक पोती बनकर लिख रही हूँ।

बात उस समय की है जब स्कूलों में पहली बार वोकेशनल कोर्स शुरू हुए थे। सरकार ने किताबों में होम साइंस विषय तो जोड़ दिया, पर लैब देना भूल गई। हमारे पास टूटी-फूटी बेंचें और एक ब्लैकबोर्ड था। प्रिंसिपल ने कहा - "फंड नहीं है।"

पर मेरी अम्मा के पास फंड से बड़ी चीज़ थी - हौसला।

मेरी अम्मा मेरी दादी भी थीं, मेरे स्कूल की होम साइंस टीचर भी, और मेरी NCC इंस्ट्रक्टर भी। एक ही इंसान के तीन रूप।

उन्होंने हार नहीं मानी। उन्होंने लड़कियों को खाना बनाना सिखाना शुरू किया - समोसे, पोहा, अचार, केक। खुशबू पूरे स्कूल में फैल जाती। और फिर उन्होंने एक ऐसा आइडिया दिया जिसने सबको हैरान कर दिया।

उन्होंने कहा, "जो आज क्लास में बनाया है, उसे रिसेस में कैंटीन में बेच दो।"

पहले तो हम सब शरमाए। कौन खरीदेगा? पर अगले दिन पूरा स्कूल इंतजार कर रहा था। टीचर, चपरासी, बच्चे - सब लाइन में लगे थे। क्योंकि वो सिर्फ खाना नहीं था, वो उन बच्चियों की मेहनत थी।

और वो पैसा? रोज़ के 10 रुपये, 20 रुपये, 50 रुपये... अम्मा ने एक रुपया भी अपने पास नहीं रखा। स्टाफ रूम में एक स्टील के डिब्बे में जमा करती रहीं। महीने के अंत में एक बर्नर आया, फिर बर्तन आए, फिर सिलाई मशीन, फिर ओवन।

दो साल में, उसी कैंटीन के छोटे-छोटे पैसों से पूरी होम साइंस लैब तैयार हो गई। सरकार ने नहीं, बच्चों के पसीने ने वो लैब बनाई। ये आज के आत्मनिर्भर भारत का सबसे पहला उदाहरण था, शब्द बनने से भी पहले।

लेकिन अम्मा का ये एक ही रूप नहीं था।

सुबह 10 बजे वो सॉफ्ट होम साइंस टीचर थीं, प्यार से आटा गूंथना सिखाती थीं।
11 बजे उसी साड़ी में वो NCC ग्राउंड में सख्त इंस्ट्रक्टर बन जाती थीं। उनकी आवाज़ गूंजती थी - "लेफ्ट-राइट-लेफ्ट!" उन्होंने मुझे ताकत, आत्मविश्वास और निडरता सिखाई।

और शाम 6 बजे घर आकर वो मेरी नर्म दादी बन जाती थीं, जो मेरे सिर में तेल लगाती और कहतीं - "बहादुर बनो, पर दिल हमेशा नर्म रखना।"

उन्होंने मुझे जिंदगी का सबसे बड़ा सबक सिखाया - *घर और स्कूल दोनों जगह अलग-अलग किरदार कैसे निभाते हैं।* कैसे एक ही समय में सॉफ्ट और बोल्ड रहा जाता है।

उन्हीं को देखकर मैं बड़ी हुई। जीवन का हर पहलू उन्हीं से सीखा।

आज मेरे पास फंड है, स्मार्ट लैब है, स्टाफ है। पर जब भी कोई मुश्किल आती है, मैं कंप्यूटर नहीं देखती। आँखें बंद करके सोचती हूँ - "मेरी अम्मा 10 रुपये और हिम्मत से क्या करतीं?"

उनकी बनाई हुई लैब आज भी उस स्कूल में है। बर्नर पुराना हो गया है, पर उन्होंने जो आग मेरे अंदर जलाई थी, वो आज भी नई है।

ये सिर्फ मेरी कहानी नहीं है, ये हर उस टीचर की कहानी है जो बिना संसाधन के, सिर्फ अपने जुनून से देश बनाता है।

सभी अम्मा जैसी टीचर्स को सलाम।