रात का दिन : क्या इंसान बनेगा भगवान? एक अद्भुत प्रयोग — अति
रात का दिन : क्या इंसान बनेगा भगवान?
एक अद्भुत प्रयोग — अति नवाचारी नव-विज्ञान गल्प
डॉ. दीपक गोस्वामी
मानवीय व्यवहार वैज्ञानिक
इक्कीस सौ पैंतीस की एक रात। गाँव की छत पर एक बच्चा लेटा था। उसने आकाश की ओर देखा और दादी से पूछा—“दादी, तारे कैसे दिखते थे?”
दादी चुप रहीं।
क्योंकि ऊपर तारे थे ही नहीं।
आकाश में शीशों की एक विराट माला घूम रही थी। पचास हजार विशाल दर्पण। प्रत्येक दर्पण सूर्य की किरणों को पकड़कर धरती के किसी न किसी हिस्से पर उतार रहा था। जहाँ खेत था, वहाँ दिन। जहाँ शहर था, वहाँ दिन। जहाँ जंगल था, वहाँ भी दिन।
रात जैसे धरती से चोरी हो गई थी।
शुरू में मनुष्य को लगा—उसने प्रकृति का सबसे बड़ा रहस्य जीत लिया है।
किसान खुश था। अब वह रात में भी फसल काट सकता था। ऊर्जा वैज्ञानिक उत्साहित थे। सौर ऊर्जा संयंत्रों ने घोषणा की—अब बिजली का उत्पादन रात में भी होगा। पहाड़ों में फँसे यात्रियों को लगा—अँधेरी रात अब उनके लिए कोई समस्या नहीं रहेगी।
एक दर्पण भेजा गया।
फिर सौ।
फिर हजार।
और देखते-देखते पचास हजार दर्पण पृथ्वी की कक्षा में पहुँच गए।
मनुष्य ने घोषणा की—“हमने रात को समाप्त कर दिया है।”
लेकिन प्रकृति ने कोई उत्सव नहीं मनाया।
कुछ वर्षों बाद वैज्ञानिकों ने देखा कि पेड़ों की जैविक घड़ी बिगड़ रही है। पत्तियों को भी विश्राम चाहिए था। फूलों को खिलने और बंद होने का अपना समय चाहिए था। बीजों को अँधेरे का स्पर्श चाहिए था। लगातार प्रकाश ने पौधों की प्राकृतिक लय को विचलित कर दिया। फल छोटे होने लगे, बीजों की क्षमता घटने लगी और जंगलों की मौन दिनचर्या बदलने लगी।
फिर पक्षियों ने रास्ते खोने शुरू कर दिए।
वे कभी तारों से दिशा पहचानते थे। अब आकाश तारों का नहीं, दर्पणों की चमक का था। प्रवासी पक्षियों के रास्ते बदलने लगे। कुछ शहरों में भटककर गिर पड़े, कुछ समुद्र के ऊपर अपना मार्ग खो बैठे।
समुद्र भी बदलने लगा।
रात में समुद्र की सतह के निकट आने वाले सूक्ष्म जीव प्रकाश से बचने लगे। उनके पीछे आने वाली मछलियों का भोजन घटा। समुद्री खाद्य-शृंखला में हल्की-सी दरार पड़ी, लेकिन उस छोटी दरार का प्रभाव धीरे-धीरे पूरे समुद्र तक पहुँचने लगा।
फिर मनुष्य की बारी आई।
रात केवल अँधेरा नहीं थी। वह शरीर की जैविक घड़ी का विश्रामकाल थी। आँखों को अँधेरे की आवश्यकता थी। मस्तिष्क को भी।
लेकिन अब रात में भी दिन जैसा प्रकाश था।
नींद कम होने लगी। लोग कृत्रिम निद्रा के सहारे सोने लगे। बच्चे बेचैन रहने लगे। बुजुर्गों की जैविक लय बिगड़ने लगी। मुर्गे समय भूलकर आधी रात में बाँग देने लगे।
तब वैज्ञानिकों ने पहली बार प्रश्न पूछा—
“क्या हमने अँधेरे को समाप्त करके जीवन की एक अनिवार्य व्यवस्था को ही समाप्त कर दिया है?”
लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी।
दूरबीनों से आकाश देखा गया।
तारे दिखाई नहीं दे रहे थे।
हर तस्वीर में चमकती हुई लकीरें थीं। पचास हजार दर्पण वैज्ञानिकों के लिए ब्रह्मांड को देखने वाली आँखों पर पर्दा बन चुके थे।
बच्चे पाठ्यपुस्तकों में आकाशगंगा देखते थे, लेकिन अपने वास्तविक आकाश में उसे खोज नहीं पाते थे।
फिर विवाद शुरू हुआ।
एक शहर बोला—“हमें पूरी रात प्रकाश चाहिए।”
एक गाँव ने कहा—“तुम्हारी रोशनी हमारे घरों में घुस रही है। हमें अँधेरा चाहिए।”
एक देश ने दूसरे देश की सीमा की ओर दर्पणों का प्रकाश मोड़ दिया।
जिस रोशनी को मनुष्य ने जीवन का वरदान समझा था, वह धीरे-धीरे राजनीतिक शक्ति और रणनीतिक हथियार में बदलने लगी।
फिर एक रात सूर्य से तीव्र सौर तूफान आया।
पृथ्वी के चारों ओर घूम रहा दर्पण-जाल अस्थिर हो गया।
कुछ दर्पण घूम गए।
कुछ टूट गए।
एक विशाल दर्पण की किरण एक घने जंगल पर जा टिकी।
पहला दिन बीता।
दूसरा दिन बीता।
तीसरे दिन जंगल आग की लपटों में बदल गया।
मनुष्य ने प्रकाश पैदा करने की व्यवस्था तो बना ली थी, लेकिन उसे रोकने की व्यवस्था उतनी मजबूत नहीं बनाई थी।
तब पहली बार सभ्यता को समझ आया—
रोशनी का बटन बनाना आसान है, लेकिन जब बटन नियंत्रण से बाहर हो जाए तो उसे बंद करना कहीं अधिक कठिन है।
जंगल की राख के पास वही बच्चा खड़ा था।
उसने दादी से पूछा—
“दादी, अँधेरा कैसा होता था?”
दादी ने कुछ नहीं कहा।
उन्होंने बच्चे की आँखों पर अपनी हथेली रख दी।
“आँखें बंद करो।”
बच्चे ने आँखें बंद कर लीं।
दादी बोलीं—
“जो अभी दिखाई नहीं दे रहा, वही अँधेरा है।”
“इसी अँधेरे में तारे टँके रहते थे। इसी में बीज फूटते थे। इसी में पक्षी विश्राम करते थे। इसी में समुद्र साँस लेता था। इसी में मनुष्य अपने भीतर उतरता था।”
बच्चा चुप रहा।
दादी ने उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा—
“बेटा, अँधेरा डर नहीं था। वह प्रकृति की गोद था।”
बहुत दूर आकाश में एक टूटा हुआ दर्पण घूम रहा था।
उसकी चमक क्षण भर के लिए बच्चे के चेहरे पर पड़ी।
बच्चे ने ऊपर देखा।
उसे पहली बार समझ आया कि मनुष्य ने सूरज को अपने हाथ में लेने का सपना तो देख लिया था, लेकिन सूरज के साथ चलने वाली रात को समझना भूल गया था।
उस दिन पृथ्वी के वैज्ञानिकों ने एक नया सिद्धांत लिखा—
प्रकृति पर विजय मनुष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि नहीं हो सकती। प्रकृति के संतुलन को समझ लेना ही मनुष्य की सबसे बड़ी बुद्धिमत्ता है।
मनुष्य भगवान बनने निकला था।
लेकिन प्रकृति ने उसे एक सरल प्रश्न के सामने खड़ा कर दिया—
“यदि तुम जीवन देने वाली रोशनी को नियंत्रित नहीं कर सकते, तो क्या तुम्हें सचमुच भगवान बनने का अधिकार है?”
शायद मनुष्य का भविष्य इस प्रश्न के उत्तर में छिपा था।
क्योंकि महान होना हमेशा अधिक प्रकाश पैदा करना नहीं है।
कभी-कभी महान होना यह जानना भी है कि—
कब रोशनी जलानी है,
कब उसे बुझाना है,
और कब प्रकृति के अँधेरे को
उसका अपना आकाश लौटा देना है।