अंधाधुंध मुनाफाखोरी और अनैतिक व्यापार: बिचौलियों, व्यापारियों और बड़े प्रसंस्करणकर्ताओं का लालच इस
आखिर ज़िम्मेदार कौन?
इस पूरे चक्रव्यूह में किसी एक पक्ष को दोषी ठहराकर पल्ला नहीं झाड़ा जा सकता। यह एक बहुस्तरीय विफलता है:
अंधाधुंध मुनाफाखोरी और अनैतिक व्यापार: बिचौलियों, व्यापारियों और बड़े प्रसंस्करणकर्ताओं का लालच इस समस्या की सबसे बड़ी धुरी है। कम लागत में अधिक लाभ कमाने की प्रवृत्ति ने मानवीय संवेदनाओं को पूरी तरह कुंद कर दिया है।
नियामक एजेंसियों और निगरानी तंत्र की विफलता:
संसाधनों की कमी: 1.4 अरब से अधिक की आबादी वाले देश में अत्याधुनिक फूड टेस्टिंग लैब्स और प्रशिक्षित 'फूड सेफ्टी ऑफिसर्स' (FSO) का भारी अभाव है।
भ्रष्टाचार और ढिलाई: स्थानीय स्तर पर नियमित औचक निरीक्षण और पारदर्शी सैंपलिंग की व्यवस्था का अभाव व्यापारियों को खुली छूट देता है।
कमजोर कानूनी क्रियान्वयन: खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (FSSA), 2006 में कड़े प्रावधान होने के बावजूद लंबी न्यायिक प्रक्रिया और लचर पैरवी के चलते मिलावटखोर आसानी से छूट जाते हैं।
उपभोक्ता जागरूकता का अभाव: भारत में आम उपभोक्ता अक्सर पैकेज्ड या खुले खाद्य पदार्थों की शुद्धता, FSSAI लाइसेंस नंबर या न्यूट्रिशनल लेबलिंग की जांच नहीं करते। घर-घर स्तर पर त्वरित परीक्षण (DART - Detect Adulteration with Rapid Test) किट के उपयोग की समझ बेहद सीमित है।
क्या हो समाधान की राह?
खाद्य सुरक्षा को एक राष्ट्रीय आपातकाल की तरह देखने की आवश्यकता है:
'जीरो टॉलरेंस' नीति और त्वरित न्याय: मिलावट को केवल आर्थिक अपराध न मानकर इसे 'मानव स्वास्थ्य के विरुद्ध जघन्य अपराध' के रूप में देखा जाए। त्वरित सुनवाई (Fast-track courts) के जरिए दोषियों को कठोर कारावास और संपत्ति जब्ती जैसी सजा दी जाए।
डिजिटल ट्रैकिंग और सप्लाई चेन सुधार: 'खेत से थाली तक' (Farm to Fork) सप्लाई चेन में ब्लॉकचेन और क्यूआर कोड तकनीक का इस्तेमाल अनिवार्य किया जाए ताकि उपभोक्ता खाद्य स्रोत की प्रामाणिकता जांच सके।
परीक्षण अवसंरचना का विस्तार: हर जिले में मोबाइल फूड टेस्टिंग वैन और एनएबीएल (NABL) मान्यता प्राप्त प्रयोगशालाओं का जाल बिछाया जाए।
सशक्त नागरिक आंदोलन: उपभोक्ताओं को अपने अधिकारों के प्रति सजग होना होगा। किसी भी संदिग्ध उत्पाद की तत्काल शिकायत 'फूड सेफ्टी कनेक्ट' पोर्टल पर दर्ज कराने की संस्कृति विकसित करनी होगी।
भोजन केवल पेट भरने का साधन नहीं, बल्कि देश के वर्तमान और भविष्य की कार्यक्षमता की नींव है। यदि नागरिक हर निवाले के साथ रोग खरीदने को विवश हैं, तो आर्थिक विकास के तमाम दावे खोखले साबित होंगे। अब समय केवल चिंता जताने का नहीं, बल्कि जवाबदेही तय कर मिलावटखोरों पर निर्णायक प्रहार करने का है।