स्मार्ट दिखने का नया 'सॉफ्टवेयर अपडेट
स्मार्ट दिखने का नया 'सॉफ्टवेयर अपडेट'
एक जमाना था जब समझदारी दिमाग से मापी जाती थी, लेकिन नए जमाने के फैशन ने तय किया है कि अगर आप 'स्मार्ट' दिख नहीं रहीं, तो आपके दिमाग की फाइल करप्ट मानी जाएगी। आज की दुनिया में महिला होने से ज्यादा जरूरी हो गया है 'स्मार्ट वुमन' के सांचे में 4K रेजोल्यूशन के साथ फिट होना।
सुबह की शुरुआत अब चाय से नहीं, बल्कि एक 'एस्थेटिक' ग्रीन टी के कप की इंस्टाग्राम स्टोरी से होती है। स्मार्ट दिखने का पहला नियम है कि सादगी को त्यागकर 'मिनिमलिस्टिक लुक' अपनाया जाए। सादा पानी पीना अब आउटडेटेड है; जब तक उसमें खीरे की दो स्लाइस और चिया सीड्स तैरते न दिखें, तब तक मेटाबॉलिज्म को समझ ही नहीं आता कि जागना है।
बाजार ने भी इस होड़ को खूब भुनाया है। अलमारी में कपड़े अब तन ढकने या आराम के लिए नहीं, बल्कि 'पावर ड्रेसिंग' के लिए टंगे होते हैं। ब्लेजर ऐसा होना चाहिए जिसे पहनकर लगे कि महिला बस अभी-अभी किसी मल्टी-बिलियन डॉलर टेक कंपनी का मर्जर साइन करके लौटी है—भले ही वह कॉलोनी के व्हाट्सएप ग्रुप में दूध वाले के हिसाब पर बहस कर रही हो।
बातचीत की भाषा का तो पूरा व्याकरण ही बदल चुका है। अब किसी बात से सहमत होना हो, तो 'हां' या 'ठीक है' बोलना अपराध जैसा लगता है। मुंह से तुरंत निकलना चाहिए—“आई टोटली रेजोनेट विद दिस!” समस्याओं को अब 'प्रॉब्लम' नहीं, 'इशू' कहा जाता है; और घरेलू काम अब 'टास्क' और 'मल्टीटास्किंग' का हिस्सा बन चुके हैं।
सबसे बड़ा युद्धक्षेत्र तो सोशल मीडिया है। वहाँ हर तस्वीर के पीछे बीस मिनट का 'कैंडिड' पोज और दस तरह के फिल्टर की तपस्या होती है। बालों को ऐसे बिखेरना पड़ता है मानो हवा ने नहीं, किसी इटालियन हेयर-स्टाइलिस्ट ने खुद आकर उन्हें हवा में उछाला हो। स्मार्टनेस का पैमाना यह नहीं रहा कि आपने किताब कौन सी पढ़ी, बल्कि यह है कि उस किताब के कवर के साथ ब्लैक कॉफी का एंगल कितना सटीक बैठा।
इस पूरी होड़ का सबसे दिलचस्प पहलू यह है कि स्मार्ट दिखने की इस अंधी दौड़ में 'खुद' बने रहने की फुर्सत किसी के पास नहीं बची। असली बुद्धिमत्ता शायद यही मानकर चुपचाप मुस्कुरा रही है कि जब तक दुनिया फिल्टर और एटीट्यूड के सहारे 'स्मार्ट' साबित होने में व्यस्त है, तब तक सुकून से बिना किसी एंगल की चिंता किए चाय की चुस्की ले ली जाए।